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इसी प्रकार झील के बीच में एक टापू पर पार्क बना था, वहां कुछ देर बिताकर फिर नाश्ता कर हम शालीमार गार्डन गए | कैब बोट वाले ने ही कर दी थी | ये एक बहुत खूबसूरत उद्दान है पर फैमिली वाले ज्यादा एन्जॉय कर सकते हैं हमें तो प्राकृतिक सौन्दर्य ही अधिक पसंद है |

यहीं से हम गुलमर्ग जिसका प्राचीन नाम गौरीमर्ग है, के लिए रवाना हुए | ये श्रीनगर से 50 किमी की दूरी पर स्थित है | श्रीनगर से आगे बढ़ते ही चावल के खेत और सेब के बगान हैं और दूर तक फैली वैली इन्हें आदर्श माहौल उपलब्ध कराती है | फिर पहाड़ शुरू होते हैं जिनमें सांप – सीढ़ी की तरह चढ़ती सड़क और उसके आस – पास के सुन्दर दृश्य बहुत अच्छे लगते हैं और काफी देर इस तरह चढ़ने के बाद आप गुलमर्ग पहुँच जाते हैं | इसका प्राचीन नाम गौरीमर्ग है और ये लगभग 2650 मीटर की ऊँचाई पर है |

ये बेहद सुन्दर जगह है, दूर तक फैले देवदार और चीड़ | आप यहाँ आराम से दो – तीन दिन बिता सकते हैं | यहाँ हमारे पास बस कुछ घंटे ही थे तो थोड़ा इधर – उधर घूमने के बाद गोल्फ कोर्स से लगी सड़क में टहलने के बाद हम गंडोला की ओर बढ़ गए | ये एक टू पार्ट रोप वे है जो अपने आप में दुनिया के सबसे ऊँचे रोपवे में से एक है | पहला चरण आपको कोंग्ड़ोरी जो कि 3000 मीटर की ऊंचाई पर है, वहां ले जाता है | गुलमर्ग में बादल थे और मौसम ठीक – ठाक ठण्डा था | इसकी ढलाने बहुत आकर्षक हैं और उसमें बिछी घास की चादर और उसे घेरे पर्वत और देवदार सब जैसा एक पेंटिंग की तरह लगता है | यहाँ तक घोड़े से या पैदल भी आ सकते हैं |

इन्हीं ढालों पर सर्दियों में नयी बर्फ पर विंटर गेम्स होते हैं और दुनिया भर के स्कीअर्स यहाँ आते हैं | अपनी इन्हीं आकर्षक ढालों के लिए और बेहद अच्छी स्नो क्वालिटी के लिए ये दुनिया भर में प्रसिद्द है | हम भी इन्हीं ढालों पर यहाँ – वहाँ दौड़े और घूमे | शायद मैगी खाई और चाय पी और फिर दूसरे पार्ट के रोपवे की टिकेट ली | ये यहाँ से आपको सीधे एक पर्वत टॉप जिसकी ऊँचाई 4000 मीटर से भी कुछ अधिक है, वहां ले जाता है | इतनी ऊँचाई पर बहुत तेज हवा चलती है और पुरानी  सख्त बर्फ मिलती है | हम भी जब रोपवे से बाहर आये तो बिल्डिंग के अन्दर ही तेज बर्फीली हवाओं से सामना हुआ |

मैंने और पांडेजी ने बस एक हल्की सी जैकेट डाली हुई थी जो बिल्कुल ही नाकाफी थी | हमें तो यहाँ आने से पहले पता ही नहीं था कि गुलमर्ग में है क्या ? खैर अन्दर ही काफी पी कर थोड़ी हिम्मत जुटाई और भागकर बिल्डिंग से बाहर निकले | पत्थरों से होते हुए हम इसके ऊपर पहुँचे | जमी हुई पुरानी बर्फ थी जो बहुत फिसल रही थी और लोग इस पर फिसल कर मजा कर रहे थे | कुछ लोकल लोग चमड़े का कपड़ा नुमा एक टाट जैसा आइटम लेकर उसपर लोगों को बिठाकर फिसला रहे थे | हम तो ऐसे ही खूब फिसले और फोटो ली | इतनी अधिक ठण्ड में जींस भी गीली हो गयी | तापमान दो – तीन डिग्री से अधिक नहीं रहा होगा | यहाँ से दूर अपना बॉर्डर तक का नजारा दिखता है और हिमालय की और भी अधिक ऊँची बर्फ से ढकी चोटियों के भी दर्शन होते हैं | हम शायद यहाँ आधे घंटे रहे होंगे | उससे अधिक देर ठण्ड बर्दास्त करना हमारे बूते से बाहर की चीज थी | फिर वापस उसी बिल्डिंग में आ गए |

अब पता नहीं क्यों ठण्ड कम लग रही थी और थोड़ी देर गंडोले में अपनी बारी का इंतजार कर वापस नीचे आ गए | ये एक फ्रेच कंपनी ने डिजाईन किया है और पूरी तरह से सीसे से कवर है जिससे अन्दर मौसम का प्रभाव नहीं पड़ता और बढियां नजारा दिखता है |

वापस नीचे आकर हम थोड़ी देर और यहाँ – वहाँ घूमे फिर गर्मागर्म आलू के पराठे खाए | ये एक कमर्शियल टूरिस्ट सेंटर है और बहुत पर्यटक आते हैं | यहाँ घूमने के लिए और भी बहुत स्थान हैं | यहाँ एक महाराजा द्वारा बनवाया हुआ शिवपार्वती मंदिर भी है, पर वही अफ़सोस वाली बात हमारे पास तो समय ही नहीं था | कृपया आप हो सके तो समय जरूर ले कर आयें |

वापस श्रीनगर पहुँचकर हम बहुत प्राचीन और पहाड़ी के ऊपर बने शंकराचार्य मंदिर गए | ये आदि शंकराचार्य के द्वारा स्थापित माना जाता है, जिसका समय – समय पर जीणोद्धार अलग- अलग राजाओं द्वारा होता आ रहा है | श्रीनगर घाटी से ये तीन सौ मीटर ऊपर स्थित एक पहाड़ी पर स्थित है | मंदिर बिल्कुल एक विराट शिवलिंग की आकृति का है और इसके थोड़ा पहले ही गाड़ियाँ रोक दी जाती हैं | मंदिर में बहुत सी खड़ी सीढियाँ हैं जिन्हें चढ़कर हम इसके प्रांगण में पहुँचते हैं | इसके अन्दर आदि शंकराचार्य जी की मूर्ति और एक शिवलिंग है, जहाँ हमने पूजन – अर्चन किया और फिर इसके बाहर आ गए | इसकी विशेषता है, यहाँ से दिखता श्रीनगर का 360 डिग्री व्यू | क्योंकि ये बिल्कुल पहाड़ी के टॉप पर स्थित है तो इसके परिक्रमा मार्ग में पूरा श्रीनगर शहर दिखता है | झेलम, डल झील, कोई और एक – दो बड़ी झीलें, दूर पहाड़ी पर स्थित कोई किला और भी बहुत कुछ | बेहद सुन्दर दृश्य है |

ये स्थान ध्यान और तपस्या के सर्वथा योग्य है और संभवतः इसी लिए यहाँ आदि शंकराचार्य ने तपस्या की थी | कुछ समय यहाँ बिताने के बाद वापसी में हम झील किनारे स्थित हजरत बल दरगाह होते हुए वापस सात – आठ बजे के आस – पास हाउसबोट में पहुँच गए |

आज इतना घूमने के कारण हम बहुत थक गए थे, तो खाना खाकर जल्दी ही सो गए | अगले दिन सुबह कुछ और बचे – खुचे स्थान और बाग़ देखकर हम खाना खाकर, हाउस – बोट से विदा हुए | टैक्सी स्टैंड पहुँचे जहाँ जम्मू जाने के लिए बहुत सी बसें और जीपें थीं | हम भी एक जाईलो जो भर रही थी उसमें बैठ गए | इस बार सीट बीच वाली थी तो बहुत अच्छा नजारा नहीं दिख पा रहा था |

ये लगभग 300 किमी की दूरी ये जीप वाले एक – दो जगह पर रोक कर ही पूरी कर लेते हैं | इसमें बहुत से सुन्दर दृश्य आते हैं, जवाहर सुरंग भी पड़ती है और बहुत सी बड़ी चल रही परियोजनाएँ भी पड़ीं | रस्ते में गाड़ी बेहद ऊँचे और सुन्दर द्रश्यों से भरे पटनीटॉप से होकर गुजरी और मेरा और पांडेजी का मन हुआ कि यहीं उतर लिया जाय पर फिर वही समय’ ?

अब 2017 में डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी टनल का उद्घाटन होने के बाद पटनीटॉप बाईपास हो जाता है जिससे जम्मू और श्रीनगर की दूरी 30 किमी कम हो गयी है | पहले बनिहाल के पास लगभग 3 किमी लम्बी जवाहर टनल पड़ी थी | पटनीटॉप से थोड़ा आगे बढ़कर ऊधमपुर क्रॉस कर हमनें एक पहाड़ी पर रात्रि में खूब से लाइट देखीं जो नीचे से ऊपर की ओर जाते किसी रस्ते को बता रही थीं | ये देख कर हम अनुमान ही लगा रहे थे, कि एक लोकल सहयात्री जो जीप में श्रीनगर से हो चढ़ा था वह बोल पड़ा, ये माता वैष्णो देवी जाने का रस्ता है जो त्रिकुटा पहाड़ी पर है | यही आगे कटरा के लिए मोड़ मिलेगा पर अब रात के नौ बजने वाले हैं, तो अगर किसी को दर्शन करने हों तो वह जम्मू उतारकर वापस साधन से आये | यहाँ कोई खाली गाड़ी नहीं मिलेगी |

रस्ते में एक – दो बार मेरे मन में ये बात पहले आयी थी, पर थोड़ा संदेह था | मैं बहुत छोटे पर एक बार यहाँ आया था, और अब कुछ धुंधली यादें ही बची थीं | लग रहा था कि अब पता नहीं अमरनाथ यात्रा के बाद शरीर में इतनी ताकत बची है, जो माता के दरबार में जा सकूँगा पर पांडेजी का हौसला बुलंद था | उन्होंने कहा, “ अरे चिंता मत करो ! अवश्य जायेंगे और माता के दर्शन करेंगे |” उनकी बात मानकर थोड़ा हौसला बढ़ा | तो जम्मू में उतरकर एक होटल में खाना खाया और अब ग्यारह बजने वाले थे | एक जीप भर रही थी और बिल्कुल पीछे वाली सीट जहाँ यात्रिओं के सामान ही अधिक था, वहां हमें जगह मिली | जीप चली और मुझे नींद आ गयी जो  शायद कटरा पहुँचने पर ही खुली |

कटरा जम्मू से कुछ 45 किमी की दूरी पर स्थित है और जहाँ से कट था वहां से कोई 15 किमी ही था तो अगर हम वहीँ उतरकर शायद वाहन की प्रतीक्षा करते तो हमारे दो घंटे और साठ किमी आने – जाने के बच सकते थे | यहाँ हम शायद 12 बजे तक पहुँचे होंगे, जल्दी से एक होटल किया और सो गए |

अगले दिन सुबह हम जल्दी उठे, नहाकर सीधे दर्शनों के लिए निकल पड़े | काउंटर से टिकेट ली और लग गए चढ़ाई करने | थोड़ा सीढियों से और थोड़ा घुमावदार रास्तों से | कल की थकान अब महसूस नहीं हो रही थी | ये माता की कृपा ही थी कि हम सहजता से बढ़े चले जा रहे थे | बचपन का तो कुछ अधिक याद नहीं पर अब रास्ता बहुत अच्छा था, हर तरह की सुविधा है | घोड़े, खच्चर, पालकी और हेलीकाप्टर तो थे ही साथ ही अर्धकुंवारी से भवन तक के बैटरी ऑटो भी चलने लगे थे | अब तो रोपवे की भी सुविधा भवन से भैरो मंदिर तक हो गयी है | शायद और भी कुछ साधन चलने लगे होंगे |

तो हम आराम से माता की जय बोलते हुए चले जा रहे थे | सामान हमारा होटल में ही था, बस एक छोटा सा थैला हाथ में था तो बहुत हल्का लग रहा था | रस्ते में जगह – जगह टॉयलेट और रेस्तरां हैं, कुल मिलाकर माता वैष्णोदेवी ट्रस्ट ने यहाँ बहुत ही अच्छा काम किया है | हमनें भी एक जगह रूककर आराम से नाश्ता किया और फिर आगे बढ़े | हमने सात बजे के आस – पास चढ़ाई आरंभ की थी | रस्ते में अमरनाथ यात्रिओं की ही संख्या अधिक लग रही थी, पर इसके बाद भी वैसे देखा जाय तो लोग अधिक नहीं थे क्योंकि मानसून का महीना था |

इसी प्रकार आराम – आराम से आगे बढ़ते हुए हम ग्यारह बजे के आस – पास अर्धकुंवारी पहुँचे | यहाँ कैसे टिकेट लेनी है और गुफा में कैसे प्रवेश करना है, ये हमारी समझ में कुछ नहीं आ रहा था तो हम माता से क्षमा – याचना करते हुए भोजन कर आगे बढ़ गए | यहाँ से मुख्य भवन कोई पांच – छह किमी रहा होगा और हम एक बजे तक वहाँ पहुँच गए | अर्धकुंवारी से ही बैटरी रिक्शा भी भवन तक चलते हैं | यहाँ हमने पूजा का सामान लिया और लाकर में मोबाइल इत्यादि जमा कर हम दर्शनों की लाइन में लग गए |

माता की कृपा से अधिक श्रद्धालु नहीं थे और लाइन भी छोटी थी जो ठीक – ठाक गति से आगे बढ़ रही थी और हम शीघ्र ही मुख्य गुफा तक पहुँच गए | अन्दर माता के दिव्य विग्रह के शांतिपूर्ण दर्शन हुए | पाण्डेजी ने एक बड़ी सी चुनरी ली थी, जो पुजारी जी ने माता को चढ़ाई | माता की जय बोलकर हम बाहर निकले और वापस सामान लेकर हमनें पास ही स्थित गुफा में महादेव जी के दर्शन करे और फिर भैरो बाबा के दर्शनों को बढ़ गए |

भैरो मंदिर यहाँ से अधिक ऊँचाई पर है | माता का दरबार जहाँ 1500 मीटर के लगभग है वहीँ भैरो मंदिर लगभग 2012 मीटर की ऊँचाई पर है और भवन से 1.5 किमी की दूरी पर है | यहाँ हम तीन बजे तक पहुँच गए | अब यहाँ आकर हलकी ठण्ड महसूस हुई और कोहरा दिखाई पड़ा | ठण्ड और कोहरे का एहसास वैसे माता के मंदिर से ही था पर अब यहाँ ये थोड़ा अधिक था | पर इस मौसम में एक शर्ट ही पर्याप्त है अगर आपको रात में न रुकना हो | यहाँ कुछ हिरण भी दिखाई पड़े और बन्दर भी |

यहाँ कुछ ही लोग थे, तो बहुत अच्छी प्रकार से दर्शन हुए | बाबा की जय बोलकर हम खुले से प्रांगण में जिसमें दूर – दूर तक के दृश्य दिखते हैं, आराम से बैठ गए | यहीं हमने चाय पी और शायद मैगी भी खाई | इस प्रकार यहाँ आधा घंटा बिताकर और माता की जय बोलकर हम वापस चल दिए | 

अब तो भैरों मंदिर तक भवन के पास से रोपवे भी बन गया है | कुल मिलाकर हर तरह की सुविधा यहाँ यात्रिओं के लिए श्राइन बोर्ड ने उपलब्ध करायी है | इस प्रकार माता की जय – जयकार करते हम वहां से चल दिए |

नीचे उतरने में तीन से चार घंटे लगे होंगे और कुल मिलाकर हम सात बजे तक वापस नीचे आ गए, नहा कर हम फ्रेश हुए और खाना खाकर आराम से सो गए | आज हम बहुत ज्यादा थक गए थे, पर माता की अभूतपूर्व कृपा रही और दर्शन सुगमता पूर्वक हुए | मन को भी बहुत संतुष्टि और शांति का अनुभव हुआ | ये यात्रा तो देखा जाय तो पांडेजी के सौजन्य से ही संपन्न हुई, अमरनाथजी की यात्रा के बाद मैं तो इतना आशान्वित नहीं था, पर उनके प्रोत्साहन और सहयोग से इसे पूरा किया |

अगले दिन हम वापस जम्मू आ गए और मैं ट्रेन पकड़कर वापस लखनऊ आ गया | पांडेजी भी दूसरी ट्रेन से अपने गंतव्य को पहुँच गए |

इस यात्रा से वापस आकर कुछ दिनों तक एक अपूर्व शक्ति और ऊर्जा का अनुभव हुआ | अब जब मैंने कई यात्राएं कर ली हैं, और इनमें से हर यात्रा के बाद मन जहाँ शांत हो जाता है और ऊर्जा – शक्ति का भी अनुभव होता है, वहीँ इस यात्रा में ये कई गुना अधिक था, इतनी शक्ति का अनुभव इसके बाद अभी तक नहीं हुआ | ये भोलेनाथ और माता जगदम्बा और मेरे आराध्य भगवान हनुमान जी की कृपा और आशीर्वाद ही था, कि ये यात्रा हो पायी और ये ऊर्जा - शक्ति का अनुभव भी उनके प्रसाद का ही फल था |

वास्तव में ये यात्रा हमें सत्य का अनुभव कराती है, आत्मा की अविनाशिता का और शरीर के इसके सहयोगी होने का | सत्य पथ की इस यात्रा में एक – एक कर शरीर और प्रकृति के बंधन, संस्कार और हर वो जो अपने से सम्बंधित अहम् इत्यादि है, वो पीछे छोड़ देना पड़ता है, सच्चिदानंद ईश्वर ही अंतिम सत्य है और उसी में अनुराग रखना चाहिए, सारे बंधनों को तोड़ और छोड़कर ही मोक्ष के दरवाजे खुलते हैं जहाँ चरम स्वतंत्रता है |

भगवान महादेव द्वारा भी इस यात्रा में एक – एक कर अपने समस्त गणों को छोड़ना यही सन्देश देता है | आज जहाँ हर ओर प्रकृति का जबर्दस्त दोहन हो रहा है; जिसके मूल में लालच, ईगो और प्रशंसा – मान प्राप्ति की तीव्र अभिलाषा और आकांक्षा है, जहाँ अहम् और व्यक्तित्ववाद हर दूसरी चीज पर भारी है, जहाँ चाहते हुए भी सही चीजों को नहीं किया जाता और गलत को चलते रहने दिया जाता है, जहाँ रक्षक भक्षक बने हुए हैं और सिवाय शोर – चोरी और लूट – खसोट के कुछ भी नहीं बचा, जहाँ प्रकृति बिल्कुल आखिरी में आती है या मायने ही नहीं रखती, जहाँ दूषित हवा – जल और अन्न एक कटु नियति बन चुके हैं और उन पर बात भी नहीं होती, जहाँ बढ़ती जनसँख्या नरकीय जीवन जीने को विवश है, हर ओर बढ़ता प्रदूषण जहाँ विकास का पर्याय है, नदियाँ जहाँ सीवर और रसायन बहाने का श्रोत हैं, केमिकल लगे फल – सब्जियां जहाँ आम हैं, जहाँ सड़कों पर बाजार हैं, जहाँ पहाड़ों पर भी बारह मीटर चौड़ी सड़कें बनाकर उनका समूल विध्वंश इस लिए किया जाता है ताकि टोल वसूला जा सके, जहाँ एनवायरमेंट मिनिस्ट्री बस एक भद्दा मजाक है और जहाँ जनता अपने भविष्य से ज्यादा कपटी नेताओं के भविष्य और चर्चा में संलग्न है, जहाँ गंगा जैसी नदियाँ बस वोट बटोरने का औजार हैं और उनके लिए सच्चा प्रदर्शन करने वाले अनशन कर – कर मर जाते हैं, उनसे सत्ता के मद में चूर अभिमानी मिलते तक नहीं, जहाँ हिमालय देवता न रह खनन का एक प्रभावी श्रोत है और जहाँ संत निरादर और मजाक के पात्र हैं और उनके वेश में कपटी जनता को लूट रहे हैं, और जहाँ जनता जिसे खुद अपनी परवाह नहीं, जिसकी सोच बस टीवी न्यूज़ देख – देख कर संकुचित और वहीँ तक सीमित हो गयी है, जो स्वार्थ की सीमा से भी आगे स्वार्थी है, जिसके लिए न तो कोई मर्यादा है, न नीति और न ही नियम और जहाँ पैसा ही एक मात्र मुक्ति है; क्या ये भारत वही भारत है ?

कृपया एक बार अमरनाथजी की यात्रा अवश्य करें |

जय महाकाल | जय भोलेनाथ | जय महादेव | जय श्री राम | जय हनुमान |  

आगे सोनमर्ग, गौरीमर्ग और श्रीनगर की फोटो स्लाइडशो में देखें ...
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|| ॐ नमः शिवाय ||

सोनमर्ग ! पृथ्वी पर अगर कहीं स्वर्ग है तो यही है, ये पंक्तियाँ यहाँ के अद्भुत दृश्यों को देखकर बिल्कुल उपयुक्त जान पड़ती हैं | श्री अमरनाथ जी यात्रा पूरी कर हम बालटाल के रास्ते सोनमर्ग होते हुए वापस श्रीनगर पहुँचे | सिंध नदी हमारे साथ चलती है |
डल झील में तैरते शिकारे | अमरनाथ यात्रा से लौटकर यात्री श्रीनगर के प्रसिद्ध स्थल जैसे डल झील, शंकराचार्य मंदिर इत्यादि भी देखते हैं |
श्रीनगर में घूमने के बाद हम गौरीमर्ग के लिए निकल पड़े | अमरनाथ यात्रा हमें कश्मीर को देखने का अवसर प्रदान करती है | यहाँ गंडोला अर्थात रोपवे भी है जो ऊँचे अफरावत पर्वत तक ले जाता है |
सोनमर्ग, डल झील, गुलमर्ग, शंकराचार्य मंदिर और माता वैष्णो देवी मंदिर के समीप चरता हिरण |
श्री शंकराचार्य मंदिर, श्रीनगर | ये एक पहाड़ी के ऊपर स्थित है और शिवजी को समर्पित है | मंदिर और शिवलिंग अत्यंत प्राचीन हैं, यहाँ से श्रीनगर शहर का चारों ओर का भव��्य दृश्य दिखाई पड़ता है |
श्री शंकराचार्य मंदिर, श्रीनगर |
माता वैष्णोदेवी मंदिर के समीप चरता हिरण |
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I am Sirkha Cow....

lost..in Himalayas....

 

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